कैसे Amazon ने सस्ती कीमतों के नाम पर पूरा बाज़ार अपने कब्जे में लिया
1997 में वॉल स्ट्रीट के बड़े-बड़े निवेशक हैरान थे। एक नई कंपनी Amazon शेयर बाज़ार में उतरी थी। कंपनी हर तीन महीने में करोड़ों डॉलर का घाटा दिखा रही थी, लेकिन उसका शेयर तेजी से ऊपर जा रहा था। कंपनी के फाउंडर जेफ बेजोस साफ कह रहे थे – “हम अभी मुनाफा कमाने नहीं आए हैं।”
सवाल था: जो कंपनी इतनी तेज़ी से पैसा जला रही है, वो दुनिया की सबसे अमीर कंपनियों में कैसे बदल रही है?
2017 में 27 साल की लॉ स्टूडेंट लीना खान ने इस पहेली को समझने की कोशिश की। उन्होंने अपने मशहूर पेपर में तर्क दिया कि Amazon कोई “नॉर्मल” बिज़नेस नहीं, बल्कि एक सोची-समझी स्ट्रैटेजी है – जो दुकानों, कंपनियों और यहां तक कि अपने ही पार्टनर्स के खिलाफ इस्तेमाल हो रही है।
यह कहानी उसी “गंदे खेल” की है, जिसने Amazon को दुनिया के बाजार का लगभग मालिक बना दिया।
शुरुआत: टैक्स कैसे बचाऊं – और Amazon की नींव
कहानी 1994 से शुरू होती है। जेफ बेजोस वॉल स्ट्रीट की एक हैज फंड कंपनी D.E. Shaw में ऊँची तनख्वाह वाली नौकरी कर रहे थे। इंटरनेट नया-नया आया था। बॉस ने उन्हें रिसर्च करने को कहा कि इंटरनेट पर क्या बेचा जा सकता है।
बेजोस ने देखा कि इंटरनेट का इस्तेमाल हर साल 2300% की रफ्तार से बढ़ रहा है। उन्होंने समझ लिया – इतनी तेज़ी से बढ़ने वाली चीज़ भविष्य में बहुत बड़ी बनेगी। वो अपनी पत्नी मैकेंज़ी के साथ कार में बैठकर नई जिंदगी शुरू करने निकल पड़े। रास्ते में मैकेंज़ी कार चला रही थीं और बेजोस लैपटॉप पर बिज़नेस प्लान लिख रहे थे।
उनके सामने दो बड़े सवाल थे:
- क्या बेचें?
उन्होंने 20 प्रोडक्ट्स की लिस्ट बनाई और अंत में किताबें चुनीं – क्योंकि किताबें छोटी थीं, भेजना आसान था और दुनिया में इतनी किताबें थीं कि कोई भी दुकान उन्हें अपनी शेल्फ पर पूरी तरह रख ही नहीं सकती थी। - कहां से शुरू करें?
उन्होंने सिएटल को चुना। यहां टेक टैलेंट था, पास में किताबों का बड़ा डिस्ट्रीब्यूटर था, और सबसे बड़ा फायदा – टैक्स वाला लूपहोल। उस समय कानून यह कहता था कि कंपनी को सिर्फ उस राज्य में सेल्स टैक्स देना है, जहां उसका फिजिकल ऑफिस या स्टोर हो।
सिएटल (वॉशिंगटन) की आबादी कम थी, मतलब वहां के ग्राहकों पर ही टैक्स देना था, बाकी पूरे अमेरिका में टैक्स-फ्री किताबें बेची जा सकती थीं। इस दांव ने Amazon को फिजिकल बुकस्टोर्स से तुरंत सस्ता बना दिया।
कंपनी के नाम के लिए पहले Cadabra और Relentless जैसे अजीब नाम सोचे गए, लेकिन आखिर में 1995 में नाम रखा गया – Amazon, दुनिया की सबसे बड़ी नदी के नाम पर, और ऑनलाइन डायरेक्टरी में ऊपर दिखने के लिए।
निवेशकों का सवाल: घाटा ही घाटा, पैसा क्यों लगाएं?
Amazon एक गैराज से शुरू हुआ। निवेशक समझ ही नहीं पा रहे थे कि “इंटरनेट पर किताबें बेचने” वाला बिज़नेस चलेगा भी या नहीं।
1995 में amazon.com लाइव हुआ, पहले सप्ताह में ही 12,000 डॉलर से ज्यादा की सेल हुई। पहले महीने में ही अमेरिका के सभी 50 राज्यों में किताबें बिकने लगीं। लेकिन स्केल करने के लिए बेजोस को और पैसा चाहिए था।
1997 में Amazon ने IPO निकाला। बेजोस वॉल स्ट्रीट के बड़े निवेशकों से मिले। कागज़ देखकर सबके होश उड़ गए – पिछला साल भारी घाटे में। सवाल सीधा था:
- “आपकी कंपनी तो करोड़ों डॉलर का नुकसान कर रही है, हम आप पर पैसा क्यों लगाएं?”
- “और अगर कल Barnes & Noble जैसी बड़ी बुकस्टोर चेन ने वेबसाइट खोल दी तो आपका क्या होगा?”
यहीं बेजोस ने वो दांव खेला, जिसने Amazon का असली चेहरा तय कर दिया।
उन्होंने साफ कहा – हम मुनाफे के पीछे नहीं, मार्केट लीडरशिप के पीछे भागेंगे।
IPO के बाद शेयरहोल्डर्स को लिखी पहली चिट्ठी में बेजोस ने साफ चेतावनी दी:
“हम फैसले मुनाफे के आधार पर नहीं, मार्केट लीडरशिप के आधार पर लेंगे। अगर आपको यह पसंद नहीं, तो हमारे स्टॉक में निवेश मत कीजिए।”
वॉल स्ट्रीट, जो आमतौर पर हर तीन महीने में मुनाफा देखती है, इस बार “ग्रोथ के सपने” पर फिदा हो गई। Amazon के शेयर चढ़ते गए, कंपनी घाटा दिखाती रही – और यही उसका सबसे बड़ा हथियार बन गया। बाकी रिटेल कंपनियों के पास इतना घाटा सहने की आज़ादी ही नहीं थी।
Amazon बनाम बाकी कंपनियां: मुनाफे की जंजीर बनाम आज़ाद घाटा
बाकी रिटेलर्स एक जाल में फंसे हुए थे। अगर वे Amazon की तरह ऑनलाइन बिज़नेस में सैकड़ों मिलियन डॉलर झोंकते, तो उनका तिमाही मुनाफा गिर जाता, शेयरहोल्डर्स नाराज़ हो जाते और शेयर प्राइस गिरते।
लेकिन Amazon के निवेशकों ने खुद ही बेजोस को “मुनाफा मत कमाओ, मार्केट पकड़ो” की छूट दे रखी थी।
पर बेजोस सिर्फ पैसा जला नहीं रहे थे, वो उसे हथियार की तरह इस्तेमाल भी कर रहे थे। इसका सबसे बड़ा उदाहरण बना – डायपर बेचने वाली एक कंपनी।
Diapers.com की कहानी: कैसे एक छोटी कंपनी को घुटनों पर लाया गया
2009 के आसपास Amazon की “S-Team” यानी टॉप मैनेजमेंट की नज़र एक छोटी सी कंपनी पर पड़ी – Quidsi, जो diapers.com नाम की वेबसाइट चलाती थी।
ये लोग डायपर और बच्चों का सामान बेचते थे, और 24 घंटे के भीतर भारी-भरकम डिब्बे घर तक पहुंचा देते थे। यह छोटा बिज़नेस दिखता था, लेकिन Amazon के लिए खतरा बड़ा था – क्योंकि उसने एक बहुत अहम कस्टमर ग्रुप पकड़ लिया था – माएँ।
Amazon की इंटरनल रिपोर्ट्स के मुताबिक, घर की लगभग 85% खरीदारी माएं तय करती हैं। जो कंपनी मां को जीत ले, वो पूरे घर का खर्च जिंदगी भर कमा सकती है। Quidsi यह जंग जीत रहा था।
Amazon ने प्लान बनाया – Plan to Win। फैसला हुआ –
- Quidsi को “नंबर वन कॉम्पिटिटर” मानकर उनकी हर कीमत को मैच करना है,
- और जरूरत पड़े तो उससे भी नीचे जाना है, चाहे जितना घाटा क्यों न हो।
Amazon ने डायपर और wipes पर भारी डिस्काउंट डाल दिए, एक नया प्रोग्राम “Amazon Mom” लॉन्च किया, जिसमें मुफ्त और तेज़ शिपिंग थी। Amazon हर बॉक्स पर घाटा उठा रहा था, लेकिन मकसद था – Quidsi को घुटनों पर लाना।
कुछ ही समय में Amazon ने इस जंग में सैकड़ों मिलियन डॉलर जला दिए।
नतीजा – Quidsi के निवेशक डर गए, नई फंडिंग बंद हो गई और कंपनी को मजबूरन खुद को बेचने का फैसला करना पड़ा। दो ऑफर थे – Walmart और Amazon।
Walmart ने ज़्यादा पैसा ऑफर किया, Amazon ने कम।
Quidsi के फाउंडर Mark Lore ने सोचा Walmart चुनना बेहतर है। लेकिन Amazon ने आखिरी धमकी दे दी –
“अगर आपने Walmart को कंपनी बेच दी, तो जिस दिन डील साइन होगी, हम अपनी साइट पर डायपर की कीमत लगभग जीरो कर देंगे।”
ऐसा होता तो Quidsi का बिज़नेस रातोंरात बर्बाद हो जाता, Walmart डील से भी पीछे हट सकता था। यानी कंपनी सड़क पर आ जाती।
दबाव में Quidsi को कम ऑफर पर Amazon को ही कंपनी बेचनी पड़ी।
कुछ साल बाद Amazon ने यह कहकर diapers.com बंद कर दिया – “यह मुनाफे में नहीं है।”
मकसद पूरा हो चुका था – कॉम्पिटिटर ख़त्म।
“घाटा उठाने का पैसा” आया कहां से? – AWS का गुप्त खेल
सवाल उठता है – Amazon इतने बड़े-बड़े घाटे कैसे झेल पा रहा था?
क्या कोई सीक्रेट फंडिंग थी?
जवाब है – नहीं।
पैसा आ रहा था Amazon के एक दूसरे बिज़नेस से – AWS (Amazon Web Services) से।
आज आप Zomato, Swiggy, Ola, OYO, Netflix, Hotstar जैसी कई सेवाएं इस्तेमाल करते हैं – इनका डेटा, सर्वर, बैकएंड सिस्टम – सब अक्सर AWS जैसे क्लाउड प्लेटफॉर्म पर चलते हैं। AWS इंटरनेट का “मकान मालिक” बन चुका है।
शुरुआत में AWS एक “गलती से पैदा हुआ” बिज़नेस था। 2000 के दशक की शुरुआत में Amazon की टीमों को हर प्रोजेक्ट के लिए अपना सर्वर, डेटाबेस, स्टोरेज सब खुद सेट करना पड़ता था। 70% समय इंफ्रास्ट्रक्चर में ही बर्बाद हो रहा था।
एक एग्जीक्यूटिव Andy Jassy ने आइडिया दिया –
एक बार पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर बनाते हैं और फिर बाकी टीमों को “किराए” पर देते हैं।
बेजोस ने सोचा – जब हम अपने लिए बना रहे हैं, तो दुनिया की बाकी कंपनियों को भी किराए पर क्यों न दें?
यहीं से जन्म हुआ क्लाउड का वो मॉडल, जिसमें कंपनियां “जितना इस्तेमाल, उतना बिल” देती हैं – जैसे घर में बिजली का मीटर।
AWS इतना सफल हुआ कि आज भी Amazon के कुल मुनाफे का बड़ा हिस्सा इसी से आता है।
यहीं से तस्वीर साफ हुई –
- रिटेल बिज़नेस (आनलाइन सामान बेचना) अक्सर घाटे में चलता रहा,
- लेकिन AWS से आने वाला मुनाफा उसी रिटेल जंग में झोंका जाता रहा,
- ताकि Walmart जैसी कंपनियां, छोटे रिटेलर्स और स्टार्टअप्स टिक ही न सकें।
Alexa, कॉर्पोरेट जासूसी और “Alexa Fund” का खेल
Amazon की अगली चाल थी – आपके घर के अंदर घुसना।
वो चाहता था कि Amazon आपकी “रोज की आदत” बने – जैसे टीवी देखना या म्यूज़िक सुनना।
इसके लिए एक डिवाइस आया – Alexa।
लेकिन इसका आइडिया भी शुरू में Amazon का अपना नहीं था। 2012 में Ubi नाम का एक डिवाइस बना – हमेशा ऑन रहने वाला, आवाज से चलने वाला कंप्यूटर। इसके फाउंडर रेमन ग्रेबलर ने Amazon को ईमेल कर दिया, उम्मीद थी कि शायद Amazon उनकी कंपनी खरीद ले।
Amazon के बड़े एग्जीक्यूटिव टोरंटो पहुंचे, पूरी टेक्नोलॉजी देखी, NDA साइन हुआ।
फिर अचानक Amazon ने वह NDA रद्द कर दिया और कुछ समय बाद ग्रेबलर से संपर्क ही बंद कर दिया।
दो साल बाद – 2014 में – Amazon ने Echo और Alexa लॉन्च कर दिया।
आइडिया लगभग वही था। Ubi धीरे-धीरे खत्म हो गया।
यह कोई एक केस नहीं था, यह एक सिस्टम बन चुका था –
Amazon ने Alexa Fund नाम का एक वेंचर फंड बनाया, जो दिखने में स्टार्टअप्स में निवेश करता था, लेकिन अंदर से उसका मकसद था – सबसे बेहतरीन आइडियाज़ और टेक्नोलॉजी तक गहरी पहुंच बनाना।
कई स्टार्टअप्स के साथ यही हुआ –
- आइडिया देखा
- पार्टनर बने
- डेटा और प्लान समझे
- और फिर जैसा न्यूक्लियस के साथ हुआ – उसका कॉपीकैट प्रोडक्ट “Echo Show” बनाकर मार्केट में उतार दिया।
Amazon बनाम अपने ही सेलर्स: “Amazon टैक्स” और कॉपीकैट प्रोडक्ट्स
Amazon ने लाखों छोटे व्यापारियों को सपना दिखाया –
“हमारे प्लेटफॉर्म पर आइए, आपका प्रोडक्ट पूरी दुनिया तक पहुंचेगा।”
लाखों सेलर्स Amazon पर आ गए। लेकिन धीरे-धीरे यह सपना एक जाल में बदल गया।
2014 में हर 100 रुपये की बिक्री पर सेलर्स लगभग 19 रुपये Amazon को फीस, कमीशन, लॉजिस्टिक्स आदि में देते थे।
समय के साथ ये हिस्सा बढ़ता-बढ़ता 45–50 रुपये तक पहुंच गया – यानी आधा पैसा Amazon को।
ये “टैक्स” कई चीजों के नाम पर लिया जाता है –
- Fulfilment by Amazon (FBA) – Amazon के गोदाम और डिलिवरी नेटवर्क की फीस,
- और सबसे बड़ा – Amazon पर ही विज्ञापन (Ads) खरीदने की मजबूरी।
अगर सेलर Ads नहीं खरीदे, तो उसका प्रोडक्ट सर्च रिज़ल्ट में नीचे दब जाता है।
जैसे किसी मॉल का मालिक कहे – “अगर अलग से पैसा नहीं दोगे, तो तुम्हारी दुकान के आगे दीवार खड़ी कर दूंगा।”
इसके अलावा, Amazon अपने सबसे ज्यादा बिकने वाले प्रोडक्ट्स को देखकर उन्हें कॉपी भी करता है।
- Fortem नाम की कंपनी की कार ट्रंक ऑर्गनाइज़र
- Allbirds के मशहूर जूते
- Carhartt की वर्क जैकेट्स
कई केस ऐसे सामने आए, जहां Amazon ने अपने इंटरनल डेटा का इस्तेमाल करके यह देखा कि कौन सा प्रोडक्ट कितना बिक रहा है, कितना मुनाफा दे रहा है – फिर उसी का सस्ता कॉपीकैट प्रोडक्ट अपने ब्रांड Amazon Basics या Essentials के नाम से लॉन्च कर दिया, और सर्च में खुद को ऊपर दिखाने लगा।
लीना खान का पेपर: “Amazon का एंटी-ट्रस्ट पैराडॉक्स”
2017 में येल लॉ स्कूल की छात्रा Leena Khan ने एक 96 पेज का पेपर लिखा – “Amazon’s Antitrust Paradox”।
उन्होंने एक सीधा सवाल उठाया –
अमेरिकी कानून पिछले 40 साल से ये मानकर चल रहा है कि जब तक कोई कंपनी कीमत नहीं बढ़ाती और कस्टमर को सीधा नुकसान नहीं पहुंचाती, तब तक वह मोनोपोली नहीं है।
मगर Amazon तो कीमतें कम रखता है, छूट भी देता है। ग्राहक खुश है।
फिर भी सबको क्यों लगता है कि कुछ गलत हो रहा है?
लीना खान ने जवाब दिया –
- Amazon कम कीमतों को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है।
- वो नुकसान उठाकर प्रोडक्ट बेचता है, ताकि Quidsi जैसे कॉम्पिटिटर्स मैदान छोड़ दें।
- और जब कॉम्पिटिटर बचता ही नहीं, तब Amazon के पास कीमत और शर्तें तय करने की पूरी ताकत आ जाती है।
उनका पेपर वायरल हुआ, और पहली बार Amazon “टेक मोनोपोली” की बहस के केंद्र में आ गया।
कांग्रेस की सुनवाई, FTC का केस – और फिर राजनीति
अमेरिकी कांग्रेस ने Amazon, Google, Facebook, Apple – चारों बड़ी टेक कंपनियों पर जांच बैठाई।
सुनवाई के दौरान Amazon के वकील ने दावा किया –
“हम किसी इंडिविजुअल सेलर के डेटा का इस्तेमाल अपने प्राइवेट ब्रांड के लिए नहीं करते।”
जबकि अंदर से कई व्हिसलब्लोअर्स और डॉक्यूमेंट्स कुछ और कहानी सुना रहे थे।
2020 में जेफ बेजोस खुद वीडियो कॉल से कांग्रेस के सामने पेश हुए। जब पूछा गया –
“क्या आप सेलर डेटा का इस्तेमाल करते हैं, हां या ना?”
तो उन्होंने कहा –
“हमारी पॉलिसी है कि ऐसा न किया जाए, लेकिन मैं गारंटी नहीं दे सकता कि इसे कभी तोड़ा नहीं गया।”
यह एक तरह से स्वीकारोक्ति थी कि सिस्टम में गड़बड़ी है।
कांग्रेस की 449 पन्नों की रिपोर्ट में साफ लिखा गया –
Amazon अपने सेलर्स पर मोनोपोली पावर रखता है और उसे तोड़ने की सिफारिश की गई।
बाद में राष्ट्रपति जो बाइडन ने लीना खान को FTC (Federal Trade Commission) की चेयरपर्सन बना दिया। FTC ने 17 राज्यों के साथ मिलकर Amazon पर बड़ा मोनोपोली केस दायर किया – आरोपों में शामिल थे:
- सेलर्स से 50% तक “Amazon टैक्स” वसूलना,
- उन्हें Ads खरीदने पर मजबूर करना,
- और अगर वे कहीं और सस्ता बेचें तो उन्हें सज़ा देना।
FTC ने मांग की – Amazon पर स्ट्रक्चरल रिलीफ लगाया जाए, यानी ज़रूरत पड़े तो कंपनी को तोड़ा भी जा सकता है।
लेकिन बाद की राजनीतिक उठापटक, चुनाव परिणाम और सत्ता बदलने के साथ ये केस धीमा पड़ गया। Amazon के तरीके, बड़े स्तर पर, आज भी बहुत नहीं बदले हैं।
भारत के सेलर्स और हमारा रोल
आज Amazon ट्रिलियन डॉलर वैल्यू वाली कंपनी बन चुका है। भारत में भी लाखों छोटे सेलर्स हैं जो अपना सामान Amazon पर बेचते हैं।
कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि:
- उन्हें अपनी बिक्री का बहुत बड़ा हिस्सा फीस, कमीशन, FBA, विज्ञापन पर खर्च करना पड़ता है,
- वे Amazon से डरते भी हैं, और उसी पर निर्भर भी हैं।
एक सेलर की कहानी में पता चला कि उसने साल भर में लाखों डॉलर की बिक्री की, लेकिन हिसाब लगाने पर देखा तो मुनाफा सिर्फ कुछ सौ डॉलर के आसपास था – बाकी सब Amazon की अलग-अलग फीस और “टैक्स” में चला गया।
Amazon अब सिर्फ “सब कुछ बेचने वाली वेबसाइट” नहीं, बल्कि वह प्लेटफॉर्म, डेटा, विज्ञापन, लॉजिस्टिक्स – सब पर नियंत्रण रखता है।
ग्राहक हो या सेलर – उसकी दुनिया में ज़्यादातर लोग अब सिर्फ किराएदार बनकर रह गए हैं।
निष्कर्ष: सस्ती कीमतों के पीछे छुपी महंगी सच्चाई
जब हम ऑनलाइन ऑर्डर करते हैं और सस्ता प्रोडक्ट देखकर खुश होते हैं, तो अक्सर हमें यह नजर नहीं आता कि:
- उस सस्तेपन की कीमत किसी छोटे सेलर ने चुकाई,
- या किसी स्टार्टअप के आइडिया ने,
- या किसी रोजगार ने,
- या भविष्य में बढ़ने वाली कीमतों ने।
Amazon की कहानी सिर्फ एक कंपनी की सफलता की कहानी नहीं है, यह इस बात की भी कहानी है कि “सस्ती कीमत” और “सुविधा” के नाम पर हम कितनी ताकत एक ही कंपनी के हाथ में सौंप रहे हैं।
अस्वीकरण
यह लेख विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों, पुस्तकों, रिपोर्ट्स, मीडिया कवरेज और उपलब्ध जानकारियों पर आधारित है। इसमें व्यक्त किए गए विचार किसी भी व्यक्ति, कंपनी, संस्था या ब्रांड की छवि को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से नहीं लिखे गए हैं। यह सामग्री केवल सूचनात्मक और शैक्षिक उद्देश्य के लिए प्रस्तुत की गई है।
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